Delimitation Bill 2026: परिसीमन भारत में एक सवैंधानिक प्रक्रिया है, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या और उनके निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार नए सिरे से तय किया जाता है .इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हर निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या लगभग बराबर हो .ताकि हर नागरिक का प्रतिनिधित्व समान हो .
What is the Delimitation Bill 2026?
16 अप्रैल 2026 को Delimitation Bill 2026 लोकसभा में पेश किया गया। यह तीन विधेयकों के पॅकेज का हिस्सा था।
- संविधान (131वां संशोधन ) विधेयक 2026 (महिला आरक्षण से जुड़ा )
- Delimitation Bill 2026
- संघ राज्य क्षेत्र कानून विधेयक 2026
Delimitation Bill 2026 के मुख्य प्रावधान
- डीलिमिटेशन आयोग का गठन : केंद्र सरकार एक आयोग बनाएगी , जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व या वर्तमान जज अध्यक्ष होंगे, मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित आयुक्त और संबंधित राज्य का इलेक्शन कमिश्नर शामिल होंगे।
- जनसंख्या आधार : आयोग नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आधार पर सीटें आबंटित करेगा। इसमें 1971 की जनगणना के आधार पर पर मौजूदा फ्रिज खत्म होगा।
- सीटों में बढ़ोतरी : लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान है।
- सीटों का पुनर्वितरण : हर राज्य में उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलेंगी। निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक रूप से सुसंगत, प्रशासनिक इकाइयों, संचार सुविधाओं आदि ध्यान में रखकर बनाए जाएंगे।
- आरक्षण : अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और महिलाओं के लिए 33 % सीटें तय होंगी।
- पुराने Delimitation Bill 2002 को रद्द किया जाएगा।
आयोग फैसले अंतिम होते हैं, इन्हे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
संशोधन विधेयक बिल लोकसभा में हारा
17 अप्रैल 2026 को संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में हार गया। इस बिल को दो तिहाई बहुमत नहीं मिला। इसके बाद सरकार तीनों विधयेक वापस ले लिए। फिलाहल यह प्रक्रिया रुक गई है।
सरकार क्यों लाना चाहती है Delimitation Bill ?
वर्तमान NDA/BJP सरकार महिला आरक्षण कानून को लागू करना चाहती है। 2023 का कानून 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण देता है। लेकिन इसे परिसीमन और नई जनगणना के बाद लागू होना है। बिना परिसीमन के यह 2029 के चुनाव में लागू नहीं हो पाएगा।
डिलिमिटेशन बिल को लेकर सरकार का तर्क
निष्पक्ष प्रतिनिधित्व : 1971 की जनगणना पर आधारित फ्रीज अब पुराना पड़ चूका है। 2026 के बाद नई जनगणना से सीटें जनसंख्या के अनुपात होनी चाहिए।
50 % बढ़ोतरी का फार्मूला : कुल लोकसभा सीटें 50 फीसदी बढ़ाकर 850 की जाएंगी। हर राज्य को सम अनुपातिक बढ़ोतरी मिलेगी। ताकि किसी राज्य का मौजूदा शेयर न घटे। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि दक्षिण के राज्यों को नुक्सान नहीं होगा। बल्कि फायदा होगा। उदाहरण :
- तमिलनाडु : 39 से 59 सीटें।
- केरल 20 से 30 सीटें।
- कर्नाटक 28 से 42
- आंध्र प्रदेश 25 से 38
- कुल दक्षिण राज्यों की 129 सीटें 195 हो जाएंगी। ( शेयर 24 % रहेगा )
- महिला सशक्तिकरण : परिसीमन के बिना महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकता। सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है।
- पारदर्शिता : आयोग पुराने कानून की तर्ज पर बनेगा, कोई मनमानी नहीं होगी।
सरकार का दावा है कि इससे उत्तर दक्षिण असंतुलन नहीं बढ़ेगा। बल्कि सभी राज्यों को न्याय मिलेगा।
विपक्ष क्यों कर रहा है Delimitation Bill का विरोध ?
विपक्ष इसे उत्तर बनाम दक्षिण का मुद्दा मान रहा है। इंडिया गठबंधन और दक्षिणी दल जैसे DMK इस बिल का विरोध कर रहे हैं।
विपक्ष के मुख्य तर्क
दक्षिण को सजा : तमिलनाडु, कर्नाटक,आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन किया है। जिससे जनसंख्या वृद्धि कम हुई। अगर सिर्फ जनगणना के आधार पर सीटें बांटी गई तो उत्तर भारत के यूपी, राजस्थान, और बिहार की सीटें बढ़ जाएंगी। जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें घट जाएंगी।
राजनीतिक साजिश का आरोप :विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी उत्तर में मजबूत है। इसलिए परिसीमन से उसे फायदा होगा। तमिलनाडु के CM एमके स्टालिन ने इसे ऐतिहासिक अन्याय बताया है। उन्होंने काला झंडा दिखाकर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि क्या भारत की तरक्की के लिए मेहनत करने का दंड मिल रहा है।
महिला आरक्षण का बहाना :सरकार आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर देरी कर रही है। विपक्ष चाहता है कि 543 सीटों पर ही 33 % आरक्षण लागू हो, बिना नई सीट बढ़ोतरी के।
संघीय ढांचे का खतरा : GDP में दक्षिण का आर्थिक योगदान ज्यादा है। लेकिन राजनीतिक आवाज कम हो जाएगी। इससे उत्तर दक्षिण विभाजन बढ़ सकता है। विपक्ष ने एकजुट होकर संविधान संशोधन विधेयक को हराया है। विपक्ष ने इसे डिलिमिटेशन के खिलाफ जीत बताया है।
संक्षेप में विवरण
यह विधेयक (Delimitation Bill) लोकतंत्र की जनसंख्या आधारित समानता बनाम क्षेत्रीय संतुलन और विकास पुरस्कार के बीच का विवाद है। सरकार इसे न्याय और महिला सशक्तिकरण का मुद्दा बता रही है। जबकि विपक्ष इसे राजनितिक शक्ति के पुनर्वितरण का षड्यंत्र मानता है। अगला कदम 2026 की जनगणना के बाद संसद पर निर्भर करेगा। यह मुद्दा आने दक्षिण भारत के राज्यों के चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकता है।

