Harish Rana passive euthanasia: Supreme Court ने हरीश राणा की मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा की अपील पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
Harish Rana को इच्छामृत्यु (passive euthanasia) की इजाजत
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जस्टिस जेबी पादरीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने AIIMS को निर्देश दिया कि मरीज हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाए। यह प्रक्रिया इस तरीके से होनी चाहिए कि मरीज गरिमा के साथ जीवन त्याग सके।
Passive Euthanasia क्या होता है?
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब यह होता है कि गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी सपोर्ट सिस्टम से मदद दी जाती है, उसे बंद कर दिया जाए या हटा लिया जाए तो मरीज की प्राकृतिक मौत हो सके। भारत में पहली बार किसी मरीज को कोर्ट से इच्छामृत्यु की इजाजत मिली है।
Harish Rana कौमा में कैसे गए ?
राजधानी दिल्ली में पैदा हुए हरीश राणा चंडीगढ़ की यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। साल 2013 में वे यूनवर्सिटी हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गिरने के बाद लगी चोट के कारण उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया। 32 वर्षीय हरीश पिछले 13 साल से कौमा में हैं और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। वे फीडिंग ट्यूब और वेंटिलेटर सपोर्ट पर जी रहे हैं। पिछले 13 साल से बेड पर पड़े होने की वजह से उनके शरीर पर जख्म बन गए हैं।
हरीश दर्दनाक स्थिति में जी रहे हैं। परिवार के लिए बेटे की ऐसी हालत देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन और पीड़ादायी हो गया है। राणा का परिवार दवाइयों, वेंटिलेटर सपोर्ट, नर्सिंग और हॉस्पिटल चार्ज आदि पर पिछले 13 साल से इतना खर्च कर चूका है कि उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई है।
हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश
- अदालत ने मरीज को इच्छा मृत्यु की इजाजत दी।
- सुप्रीम कोर्ट ने मरीज के इलाज रोकने की प्रक्रिया को शुरू करने की इजाजत दे दी है।
- हरीश को घर से अस्पताल में शिफ्ट करने का आदेश दिया है। ये व्यवस्था AIIMS करेगा।
- कोर्ट ने चरणबद्ध तरीके से वेंटिलेटर हटाने का आदेश दिया है।
हरीश मामले में विलियम शेक्सपियर का जिक्र
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पादरीवाला ने आदेश सुनाते समय विलियम शेक्सपियर के एक नाटक की पंक्तियों का जिक्र किया। उन्होंने नाटक हेलमेट की To be or not to be का जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों को कई बार इस तरह के फैसले करने पड़ते हैं।
खंडपीठ ने कहा कि डॉक्टर की ड्यूटी मरीज का इलाज करना है, लेकिन जब मरीज के ठीक होने की कोई संभावना न हो तो डॉक्टरों की ड्यूटी उसी तरह कायम नहीं रहती। यह भारत के संविधान के आर्टिकल 21 का हिस्सा है। जिसमें जीने के साथ सम्मान से मरने का भी अधिकार है।




