Hariyali Teej 2026: उत्साह के प्रतीक हरियाली तीज को श्रावणी तीज या छोटी तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार खासतौर पर उत्तर भारत के राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है।
Hariyali Teej 2026
सावन का महीना आते ही चारों तरफ हरियाली छा जाती है, बादल बरसने लगते हैं और महिलाओं के मन में एक अलग ही उत्साह भर जाता है। इसी उत्साह का प्रतीक है हरियाली तीज, जिसे श्रावणी तीज , छोटी तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार खासतौर पर उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन आखिर हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है? इसके पीछे क्या पौराणिक कथा है और इसका धार्मिक व सामाजिक महत्व क्या है? आइए विस्तार से जानते हैं।
Why is Hariyali Teej celebrated?
हरियाली तीज हिंदू पंचांग के अनुसार सावन मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह त्योहार जुलाई या अगस्त के महीने में पड़ता है। इस दिन प्रकृति अपने पूरे यौवन पर होती है — खेत-खलिहान हरे-भरे नजर आते हैं, इसीलिए इसे “हरियाली तीज” कहा जाता है।
Hariyali Teej क्यों मनाई जाती है? इसके पीछे की पौराणिक कथा
हरियाली तीज मनाने के पीछे मुख्य कारण देवी पार्वती और भगवान शिव के मिलन की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। हर जन्म में उन्होंने घोर तप, उपवास और साधना की, ताकि भगवान शिव प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करें।
अंततः सावन शुक्ल तृतीया के दिन भगवान शिव ने माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि इस दिन को शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और वैवाहिक जीवन की शुरुआत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हरियाली तीज को सुहाग का पर्व भी कहा जाता है, जो पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।
हरियाली तीज का धार्मिक और सामाजिक महत्व
हरियाली तीज का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बहुत खास है।
- सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष दिन: विवाहित महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
- कुंवारी लड़कियों के लिए भी अहम: अविवाहित लड़कियां भी मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं, क्योंकि माना जाता है कि इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करने से मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं।
- प्रकृति और मानसून का उत्सव: यह त्योहार मानसून के आगमन और धरती पर छाई हरियाली का उत्सव भी है, जो कृषि प्रधान भारत में विशेष महत्व रखता है।
- मायके और ससुराल के रिश्तों की मिठास: इस मौके पर बेटियों को मायके बुलाकर सिंधारा भेजने की परंपरा है, जिसमें मिठाई, कपड़े, चूड़ियां और श्रृंगार का सामान शामिल होता है। इससे मायके और ससुराल के रिश्तों में मिठास बनी रहती है।
हरियाली तीज की पूजा विधि
हरियाली तीज पर पूजा करने की एक खास विधि होती है, जिसे महिलाएं श्रद्धापूर्वक निभाती हैं:
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ या नए वस्त्र धारण करें।
- सोलह श्रृंगार करें — मेहंदी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर और नई साड़ी इस दिन की पहचान हैं।
- घर के आंगन या पूजा स्थल पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
- मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें, क्योंकि मान्यता है कि इससे सुहाग की उम्र बढ़ती है।
- निर्जला या फलाहारी व्रत रखें और शिव-पार्वती की कथा सुनें या पढ़ें।
- संध्या के समय आरती करें और झूला झूलते हुए सावन के पारंपरिक गीत गाएं।
हरियाली तीज पर झूला झूलने की परंपरा
हरियाली तीज पर पेड़ों पर झूले डालने और झूला झूलने की परंपरा सदियों पुरानी है। महिलाएं और लड़कियां हरे रंग के कपड़े पहनकर, हाथों में मेहंदी लगाकर झूला झूलती हैं और लोकगीत गाती हैं। यह परंपरा खुशी, उमंग और सावन के मौसम के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है।
हरियाली तीज पर हरे रंग का महत्व
इस त्योहार पर हरे रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। महिलाएं हरी साड़ी या हरे रंग के कपड़े पहनती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं और हाथों में मेहंदी रचाती हैं। हरा रंग प्रकृति, नई शुरुआत, समृद्धि और सुहाग का प्रतीक माना जाता है, जो इस पर्व की मूल भावना से पूरी तरह मेल खाता है।
हरियाली तीज सिर्फ एक व्रत या त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, प्रकृति और रिश्तों की मिठास का उत्सव है। शिव-पार्वती के अटूट प्रेम की याद में मनाया जाने वाला यह पर्व महिलाओं को अपनी परंपराओं से जोड़े रखता है और सावन की हरियाली के बीच खुशियां मनाने का अवसर देता है। यही वजह है कि साल दर साल यह त्योहार पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहा है।

