नारदा केस में जब सुप्रीम कोर्ट के सवालों के जवाब में उलझ कर रह गई सीबीआई, जाने कैसे जांच एजेंसी का दाव पलटा

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नारदा केस में जब सुप्रीम कोर्ट के सवालों के जवाब में उलझ कर रह गई सीबीआई, जाने कैसे जांच एजेंसी का दाव पलटा

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के नेताओं की नजरबंदी के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में सीबीआई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इतने सवाल उठाए है कि वह उस में उलझ कर रह गई और आखिरकार बाद में याचिका वापस लेने में ही भलाई समझी। हालांकि याचिका वापस लेने की सलाह भी सीबीआई को कोर्ट से ही मिली।

कोर्ट के सवालों से सीबीआई बुरी तरह से हिल गई कि उसने उन अभियुक्त को गिरफ्तार किया जिनके खिलाफ चार्जशीट दायर हो चुकी है। लेकिन जिनके खिलाफ चार्जशीट दायर नहीं हुई है, यह बाहर है। अदालत का इशारा है कि हाल ही में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए टीएमसी के नेताओं शुभेंदु अधिकारी और एक अन्य की तरफ था। कोर्ट ने कहा कि हमारे हिसाब से यह अभियुक्तों को प्रभावित करने की ज्यादा स्थिति में है।

न्यायमूर्ति विनीत सरण और बीआर गवाही की बेंच ने कहा कि आरोपी नजरबंदी के बावजूद सीबीआई की निगरानी में है। पीठ ने पूछा कि वास्तव में केंद्रीय जांच ब्यूरो की शिकायत क्या है? हम जानना चाहते हैं कि आप हमसे ज्यादा क्या चाहते हैं। जस्टिस बीआर गवाही ने 17 मई को कोलकाता उच्च न्यायालय की बैठक के संदर्भ में कहा कि हमने देखा है कि स्वतंत्रता से निपटाने के लिए विशेष पीठों को सौंपा गया। लेकिन यह पहली बार है कि जब एक विशेष पीठ को मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता वापस लेने के लिए सौंपा गया है। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि वह राज्य के सीएम या  कानून मंत्री का समर्थन नहीं कर रही है और केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे पर बात कर रही है। बेहतर होगा कि आप याचिका वापस ले, क्योंकि जब हम प्रतिवादियों की बात सुनेंगे तो हमें भी नहीं पता कि वो क्या बोलेंगे?

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह मामला केवल जमानत के मुद्दे का नहीं है। इसमें कानून और शासन से जुड़े बड़े मुद्दे शामिल हैं। एसजी ने कहा कि इस समय राज्य में ऐसा होता रहता है। मुख्यमंत्री और उसी की मदद के लिए पुलिस थाने में घुस जाते हैं। कानून मंत्री सीबीआई जज के सामने बैठा रहता है। एसजी ने कहा कि यदि यह तथ्य बेंच के विवेक को नहीं हिलाते हैं तो उनके पास आगे कहने के लिए कुछ भी नहीं है। केंद्र सरकार के वरिष्ठ कानून अधिकारी ने मामले को शुक्रवार तक के लिए स्थगित करने का आग्रह किया। लेकिन पीठ ने कहा कि आपके जल्द सुनवाई के आग्रह पर ही मामले की सुनवाई आज ही की जा रही है। आपने ही इसके लिए उल्लेख किया था।

जस्टिस विनीत सरण  ने कहा कि मैं 18 साल से जज हूं। सामान्यता यदि पीठ के न्यायाधीशों में से एक का जमानत के मुद्दे पर भी विचार होता है तो वह पीठ के फैसले तक को जमानत दी जाती है, जस्टिस बीआर गवाही ने भी सीबीआई से पूछा कि उच्च न्यायालय को मामले की सुनवाई की अवसर से क्यों वंचित किया जाए। आखिरकार 5 जजों की पीठ  सुनवाई कर रही है। बेंच ने सॉलीसीटर जनरल को याद दिलाया कि यहां जहां तक सावधानी अधिकारों का संरक्षण का सवाल है तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट एक ही पायदान पर है/ सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि मैं केवल कानूनी तरीके से जवाब देना चाहता हूं। एसजी ने फिर दोहराया कि मुद्दा सिर्फ जमानत का नहीं बल्कि राज्य के मंत्रियों के कहने पर गुंडागर्दी के अभूतपूर्व कृत्यों का है। जस्टिस बीआर गवाही ने कहा हम नागरिक की स्वतंत्रता के जुड़े मुद्दे को राजनेताओं के अवैध कृत्यों के साथ नहीं मिलाना चाहते हैं। हमें देखना होगा कि जमानत दी जा सकती है या नहीं। अन्य मुद्दों के संबंध में अन्य उपाय है/ उससे आपको किसी ने नहीं रोका । किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से पहले देखी जाती है।

अदालत की बेंच ने सुझाव दिया कि सीबीआई सुप्रीम कोर्ट के मामले को वापस ले और कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष मुद्दे को उठाएं। एसजी ने इसके बाद निर्देश लेने के लिए कुछ समय मांगा ।बाद में  सॉलिसिटर जनरल ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। पीठ ने सीबीआई को कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दे उठाने की आजादी के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति प्रदान की।

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