Archana एक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्होंने उत्तराखंड में सड़क चौड़ीकरण के लिए कटते हुए 4000 से अधिक पेड़ों को बचाने के लिए अपना सिर तक मुंडवा दिया।
Archana ने उत्तराखंड में आंदोलन क्यों किया ?
उत्तराखंड, देवभूमि के रूप में जाना जाने वाला राज्य, अपने प्राकृतिक सौंदर्य, हिमालयी वनों और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन हाल के वर्षों में सड़क विस्तार, चारधाम परियोजना और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों को चिंतित कर दिया।
ऐसी ही एक प्रमुख आवाज पर्यावरण कार्यकर्ता अर्चना की है, जिन्होंने ऋषिकेश-भानियावाला (या भनियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश) हाईवे चौड़ीकरण परियोजना के तहत सैकड़ों-हजारों पेड़ों की कटाई का जोरदार विरोध किया। उनके नेतृत्व और आंदोलनकारियों के दबाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार को झुकना पड़ा और पेड़ कटाई पर रोक लगानी पड़ी।
Archana और उत्तराखंड प्रोजेक्ट
सड़क चौड़ीकरण परियोजना लगभग 20-21 किमी लंबी है और 43 करोड़ की रुपए अनुमानित लागत वाली फोर/सिक्स लेन सड़क बनाने की योजना है। ‘सात मोड़’ (Saat Mod) जैसे जंगली क्षेत्रों में 4,000 से 4,475 पेड़ (कुछ रिपोर्ट्स में 3,000+ भी) काटे जाने वाले थे, जिनमें सैल (Sal), देवदार और अन्य प्रजातियां शामिल थीं। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह एलीफेंट कॉरिडोर (हाथियों का प्राकृतिक मार्ग) को नुकसान पहुंचाएगा, भूस्खलन का खतरा बढ़ाएगा, तापमान वृद्धि करेगा और भूजल प्रभावित करेगा। मानसून सीजन में कटाई शुरू होने से पर्यावरणीय आपदाओं का जोखिम और बढ़ गया।
Archana कौन हैं ? जिन्होंने चिपको आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ाया
अर्चना एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। जो उत्तराखंड में वन संरक्षण, स्थानीय पारिस्थितिकी और सतत विकास की वकालत करती रही हैं। वे चिपको आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली नई पीढ़ी की आवाज हैं। चिपको आंदोलन (1970s) में गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा आदि ने पेड़ों से चिपककर (embracing) वनों की रक्षा की थी।
अर्चना और उनके सहयोगी इसी भावना से ‘रक्षा सूत्र’ बांधने, रिले स्ट्राइक, प्रदर्शन और कानूनी रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे स्थानीय समुदायों, युवाओं और महिलाओं को जागरूक करती हैं। उनके प्रयासों में पर्यावरण संगठनों (जैसे Citizens for Green Doon, अन्यenvironmental activist स्थानीय ग्रुप्स) के साथ समन्वय शामिल है। हालांकि मीडिया में अनूप नौटियाल, हिमांशु अरोड़ा, रवि चोपड़ा जैसी अन्य प्रमुख हस्तियां भी उभरीं, अर्चना का फोकस ग्राउंड लेवल विरोध और महिलाओं की भागीदारी पर रहा।
अर्चना का आंदोलन और धामी सरकार का झुकना: चिपको 2.0
प्रदर्शनकारियों ने एनएचएआई कार्यालय घेरा, पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधे, ‘ब्लैक हरेला’ (पर्यावरण दिवस के विपरीत काला प्रतीक) मनाया, और रिले हंगर स्ट्राइक शुरू की। चिपको 2.0 की गूंज उठी, जिसमें महिलाएं पेड़ों से चिपकीं। पुलिस ने कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, लेकिन जन दबाव बढ़ता गया। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों (एलीफेंट कॉरिडोर, वन डायवर्शन) का हवाला दिया गया। कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि ट्रैफिक जाम की समस्या इतनी गंभीर नहीं है कि हजारों पेड़ों की बलि चढ़ाई जाए। विकास पर्यावरण के बिना टिकाऊ नहीं हो सकता।
अर्चना के आंदोलन के आगे धामी सरकार का फैसला
जुलाई 2026 में भारी विरोध के बाद सीएम पुष्कर सिंह धामी ने ‘सात मोड़’ साइट पर पेड़ कटाई रोक दी और स्टेकहोल्डर्स (कार्यकर्ता, विशेषज्ञ, स्थानीय) के साथ बातचीत का आदेश दिया। नई पर्यावरण समीक्षा और वैकल्पिक डिजाइन (जैसे चौड़ाई कम करना, अंडरपास) पर विचार हो रहा है। यह सरकार के लिए बड़ा मोड़ है, क्योंकि पहले चरण की अनुमतियां मिल चुकी थीं। यह पर्यावरण कार्यकर्ताओं की जीत मानी जा रही है। जो चिपको की विरासत को जीवित रखती है।
उत्तराखंड का चारधाम प्रोजेक्ट
उत्तराखंड में चारधाम प्रोजेक्ट, गंगोत्री हाईवे आदि में भी इसी तरह विरोध हुआ। गंगोत्री में चौड़ाई 12 मीटर से घटाकर 11 मीटर करने से हजारों देवदार बच गए। लेकिन कुल मिलाकर राज्य में विकास बनाम संरक्षण की टकराहट जारी है। RTI डेटा के अनुसार पिछले वर्षों में दसियों हजार पेड़ कट चुके हैं। कार्यकर्ता सतत विकास, वन रोपण की बजाय संरक्षणऔर इको-फ्रेंडली इंजीनियरिंग (कम स्लोप कटिंग) की मांग कर रहे हैं।
अर्चना जैसे कार्यकर्ताओं का संघर्ष केवल पेड़ बचाने तक सीमित नहीं; यह हिमालय की पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन, वन्यजीवों और स्थानीय आजीविका की रक्षा का मुद्दा है। धामी सरकार का झुकना लोकतंत्र और जनमत की जीत है, लेकिन लंबे समय में नीतिगत बदलाव जरूरी हैं। उत्तराखंड की हरियाली बिना इसके भविष्य अधूरा रहेगा।

