Ratanbai Jain: स्वतंत्र भारत की इकलौती फांसी, 3 जनवरी 1955

Ratanbai Jain: स्वतंत्र भारत की इकलौती और पहली महिला, जिन्हे दी गई फांसी

Ratanbai Jain: स्वतंत्र भारत में सिर्फ एक महिला को फांसी दी गई। 3 जनवरी 1955 को तिहाड़ जेल में रतनबाई जैन को तीन लड़कियों की जहर से हत्या के मामले में फांसी हुई। जानें पूरी कहानी

Ratanbai Jain: स्वतंत्र भारत की इकलौती फांसी

आजादी के बाद से अब तक भारत में सिर्फ एक महिला को कानूनी रूप से फांसी दी गई है। उसका नाम था रतनबाई जैन। 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में उसे फंदे पर लटकाया गया।

Ratanbai Jain: भारतीय न्याय इतिहास का एक दुर्लभ अध्याय

कानूनी दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, 15 अगस्त 1947 के बाद कोई और महिला इस सजा तक नहीं पहुंची। कई महिलाओं को मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन अपील, दया याचिका और कानूनी प्रक्रिया के चलते फांसी नहीं हुई। रतनबाई जैन का मामला आज भी भारतीय न्याय इतिहास का एक दुर्लभ अध्याय है।

कौन थीं रतनबाई जैन?

रतनबाई जैन दिल्ली की रहने वाली थीं। उम्र करीब 35 साल थी। वह एक फैमिली प्लानिंग यानी नसबंदी या स्टेरिलिटी क्लिनिक में मैनेजर के पद पर काम करती थीं। उस समय महिलाओं के लिए ऐसी नौकरी आम नहीं थी। वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र थीं।

कैसे हुई तीन लड़कियों की हत्या?

रतनबाई ने हथियार का इस्तेमाल नहीं किया। उसने जहर चुना। खाने या पीने की चीजों में जहर मिलाकर तीनों लड़कियों को दिया। जहर इतना तेज था कि तीनों की मौत हो गई।

पुलिस जांच में साबित हुआ कि यह हत्या रतनबाई ने ही की थी। सबूत और गवाहों के आधार पर मामला अदालत पहुंचा।

अदालत से तिहाड़ जेल तक

निचली अदालत ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर माना। तीन हत्याओं के लिए रतनबाई को मौत की सजा सुनाई गई। मामला हाई कोर्ट और फिर ऊपरी अदालतों तक गया। अपील खारिज हुई। दया याचिका भी खारिज कर दी गई।

3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में कड़ी सुरक्षा के बीच रतनबाई जैन को फांसी दे दी गई। वह आजाद भारत में फांसी पर चढ़ने वाली पहली और अब तक की इकलौती महिला बनीं।

क्यों याद रखा जाता है यह मामला?

इस केस से एक बात साफ हुई। कानून लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता। अपराध की गंभीरता देखी जाती है। रतनबाई के बाद शबनम, रेणुका शिंदे जैसी कई महिलाओं को मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन फांसी का अमल नहीं हुआ।

आज भी जब किसी महिला अपराधी को मौत की सजा की चर्चा होती है, तो रतनबाई जैन का नाम सामने आ जाता है। उनका मामला याद दिलाता है कि स्वतंत्र भारत में न्यायिक फांसी कितनी दुर्लभ है, खासकर महिलाओं के लिए।

रतनबाई जैन की कहानी सिर्फ एक हत्याकांड नहीं। यह भारतीय कानूनी इतिहास का एक सख्त अध्याय है, जो सात दशक बाद भी चर्चा में बना रहता है।

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